Category: Shaheedi Diwas


ਪ੍ਣਾਮ ਸ਼ਹੀਦਾਂ ਨੂੰ !!

ਧੰਨ ਧੰਨ ਸੰਤ ਬਾਬਾ ਜਰਨੈਲ ਸਿੰਘ ਜੀ ਖਾਲਸਾ ਭਿੰਡਰਾਵਾਲਿਆ ਅਤੇ ਬੇਅੰਤ ਸ਼ਹੀਦ ਸਿੰਘਾਂ ਸਿੰਘਣੀਆਂ ਦੀ ਸ਼ਹੀਦੀ ਨੂੰ ਕੌਟਿ ਕੌਟਿ ਪ੍ਣਾਮ ।। 

ਜੈਕਾਰਾ ਗਜਾਵੇ ਨਿਹਾਲ ਹੋ ਜਾਵੇ ਸ਼ਹੀਦ ਬਾਬਾ ਜਰਨੈਲ ਸਿੰਘ ਜੀ ਦੇ ਮਨ ਨੂੰ ਭਾਵੇ –

ਸਤਿ ਸ੍ਰੀ ਅਕਾਲ ।।

ਪਿਆਰਿਓ ਬਾਬਾ ਜੀ ਇਕ ਏਸੇ ਮਹਾਨ ਸ਼ਹੀਦ ਹੋਏ ਨੇ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਪੰਥ ਦੀ ਏਕਤਾ ਨੂੰ ਹਮੇਸ਼ਾ ਬਰਕਰਾਰ ਰੱਖਿਆ।

PLEASE SHARE

SHAHEEDI DIWAS NU KOTI KOT PARNAM

*मेरा रँग दे बसन्ती चोला,मेरा रँग दे*

*मेरा रँग दे बसन्ती चोला*

*माय रँग दे बसन्ती चोला*

Aaj ke din *23 मार्च 1931* को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर *भगत सिंह* *सुखदेव*व *राजगुरु*को फाँसी दे दी

*भगत सिंह जीवनकाल*

जन्मस्थल : गाँव बावली, जिला लायलपुर, पंजाब (अब पाकिस्तान में)

मृत्युस्थल: लाहौर जेल, पंजाब (अब पाकिस्तान में)

आन्दोलन: भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम

प्रमुख संगठन: नौजवान भारत सभा, हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसियेशन

भगत सिंह (जन्म: 26या 27सितम्बर 1907[a] , मृत्यु: 23मार्च 1931) भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। भगतसिंह ने देश की आज़ादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया, वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़े आदर्श है। इन्होंने केन्द्रीय संसद (सेण्ट्रल असेम्बली) में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया। जिसके फलस्वरूप इन्हें २३ मार्च १९३१ को इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया गया। सारे देश ने उनके बलिदान को बड़ी गम्भीरता से याद किया। पहले लाहौर में साण्डर्स-वध और उसके बाद दिल्ली की केन्द्रीय असेम्बली में चन्द्रशेखर आजाद व पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ बम-विस्फोट करके ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खुले विद्रोह को बुलन्दी प्रदान की। भगत सिंह को अराजकतावादी और मार्क्सवादी विचारधारा में रुचि थी।

सुखदेव, राजगुरु तथा भगत सिंह के लटकाये जाने की ख़बर – लाहौर से प्रकाशित द ट्रिब्युन के मुख्य पृष्ठ पर।

हिन्दी के प्रखर चिन्तक रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक स्वाधीनता संग्राम: बदलते परिप्रेक्ष्य में उनके बारे में टिप्पणी की है:

“ऐसा कम होता है कि एक क्रान्तिकारी दूसरे क्रान्तिकारी की छवि का वर्णन करे और दोनों ही शहीद हो जायें। रामप्रसाद बिस्मिल १९ दिसम्बर १९२७ को शहीद हुए, उससे पहले मई १९२७ में भगतसिंह ने किरती में ‘काकोरी के वीरों से परिचय’ लेख लिखा। उन्होंने बिस्मिल के बारे में लिखा – ‘ऐसे नौजवान कहाँ से मिल सकते हैं? आप युद्ध विद्या में बड़े कुशल हैं और आज उन्हें फाँसी का दण्ड मिलने का कारण भी बहुत हद तक यही है। इस वीर को फाँसी का दण्ड मिला और आप हँस दिये। ऐसा निर्भीक वीर, ऐसा सुन्दर जवान, ऐसा योग्य व उच्चकोटि का लेखक और निर्भय योद्धा मिलना कठिन है।’ सन् १९२२ से १९२७ तक रामप्रसाद बिस्मिल ने एक लम्बी वैचारिक यात्रा पूरी की। उनके आगे की कड़ी थे भगतसिंह।”[4]

*जन्म और परिवेश*

भगत सिंह का जन्म[5] २७ सितंबर १९०७ को हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह एक सिख परिवार था। अमृतसर में १३ अप्रैल १९१९ को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी। काकोरी काण्ड में राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ सहित ४ क्रान्तिकारियों को फाँसी व १६ अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि पण्डित चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड गये और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन। इस संगठन का उद्देश्य सेवा, त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था। भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर १७ दिसम्बर १९२८ को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे० पी० सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की थी। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने वर्तमान नई दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार संसद भवन में ८ अप्रैल १९२९ को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी।

*क्रान्तिकारी गतिविधियाँ*

उस समय भगत सिंह करीब बारह वर्ष के थे जब जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड हुआ था। इसकी सूचना मिलते ही भगत सिंह अपने स्कूल से १२ मील पैदल चलकर जलियाँवाला बाग पहुँच गये। इस उम्र में भगत सिंह अपने चाचाओं की क्रान्तिकारी किताबें पढ़ कर सोचते थे कि इनका रास्ता सही है कि नहीं ? गांधी जी का असहयोग आन्दोलन छिड़ने के बाद वे गान्धी जी के अहिंसात्मक तरीकों और क्रान्तिकारियों के हिंसक आन्दोलन में से अपने लिये रास्ता चुनने लगे। गान्धी जी के असहयोग आन्दोलन को रद्द कर देने के कारण देश के तमाम नवयुवकों की भाँति उनमें भी रोष हुआ और अन्ततः उन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिये क्रान्ति का मार्ग अपनाना अनुचित नहीं समझा। उन्होंने जुलूसों में भाग लेना प्रारम्भ किया तथा कई क्रान्तिकारी दलों के सदस्य बने। यह सर्वविदित है कि अपनी युवा उम्र से भगत सिंह गदर आंदोलन से गहरा प्रभावित था और वह करतार सिंह सराभा को अपने नायक के रूप में मानता था। उनके दल के प्रमुख क्रान्तिकारियों में चन्द्रशेखर आजाद, भगवतीचरण व्होरा, सुखदेव, राजगुरु इत्यादि थे। काकोरी काण्ड में ४ क्रान्तिकारियों को फाँसी व १६ अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि उन्होंने १९२८ में अपनी पार्टी नौजवान भारत सभा का हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन में विलय कर दिया और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन।

*लाला जी की मृत्यु का प्रतिशो*

सॉण्डर्स की हत्या के बाद एचएसआरए द्वारा लगाए गए परचे

१९२८ में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिये भयानक प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों मे भाग लेने वालों पर अंग्रेजी शासन ने लाठी चार्ज भी किया। इसी लाठी चार्ज से आहत होकर लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गयी। अब इनसे रहा न गया। एक गुप्त योजना के तहत इन्होंने पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट स्काट को मारने की योजना सोची। सोची गयी योजना के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु लाहौर कोतवाली के सामने व्यस्त मुद्रा में टहलने लगे। उधर जयगोपाल अपनी साइकिल को लेकर ऐसे बैठ गये जैसे कि वो ख़राब हो गयी हो। गोपाल के इशारे पर दोनों सचेत हो गये। उधर चन्द्रशेखर आज़ाद पास के डी० ए० वी० स्कूल की चहारदीवारी के पास छिपकर घटना को अंजाम देने में रक्षक का काम कर रहे थे।

१७ दिसंबर १९२८ को करीब सवा चार बजे, ए० एस० पी० सॉण्डर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधी उसके सर में मारी जिसके तुरन्त बाद वह होश खो बैठे। इसके बाद भगत सिंह ने ३-४ गोली दाग कर उसके मरने का पूरा इन्तज़ाम कर दिया। ये दोनों जैसे ही भाग रहे थे कि एक सिपाही चनन सिंह ने इनका पीछा करना शुरू कर दिया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने उसे सावधान किया – “आगे बढ़े तो गोली मार दूँगा।” नहीं मानने पर आज़ाद ने उसे गोली मार दी। इस तरह इन लोगों ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया।

एसेम्बली में बम फेंकना संपादित करें

भगत सिंह यद्यपि रक्तपात के पक्षधर नहीं थे परन्तु वे कार्ल मार्क्स के सिद्धान्तों से पूरी तरह प्रभावित थे। यही नहीं, वे समाजवाद के पक्के पोषक भी थे। इसी कारण से उन्हें पूँजीपतियों की मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसन्द नहीं आती थी। उस समय चूँकि अँग्रेज ही सर्वेसर्वा थे तथा बहुत कम भारतीय उद्योगपति उन्नति कर पाये थे, अतः अँग्रेजों के मजदूरों के प्रति अत्याचार से उनका विरोध स्वाभाविक था। मजदूर विरोधी ऐसी नीतियों को ब्रिटिश संसद में पारित न होने देना उनके दल का निर्णय था। सभी चाहते थे कि अँग्रेजों को पता चलना चाहिये कि हिन्दुस्तानी जाग चुके हैं और उनके हृदय में ऐसी नीतियों के प्रति आक्रोश है। ऐसा करने के लिये ही उन्होंने दिल्ली की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की योजना बनायी थी।

भगत सिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून खराबा न हो और अँग्रेजों तक उनकी ‘आवाज़’ भी पहुँचे। हालाँकि प्रारम्भ में उनके दल के सब लोग ऐसा नहीं सोचते थे पर अन्त में सर्वसम्मति से भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त का नाम चुना गया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ८ अप्रैल १९२९ को केन्द्रीय असेम्बली में इन दोनों ने एक ऐसे स्थान पर बम फेंका जहाँ कोई मौजूद न था, अन्यथा उसे चोट लग सकती थी। पूरा हाल धुएँ से भर गया। भगत सिंह चाहते तो भाग भी सकते थे पर उन्होंने पहले ही सोच रखा था कि उन्हें दण्ड स्वीकार है चाहें वह फाँसी ही क्यों न हो; अतः उन्होंने भागने से मना कर दिया। उस समय वे दोनों खाकी कमीज़ तथा निकर पहने हुए थे। बम फटने के बाद उन्होंने “इंकलाब-जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद-मुर्दाबाद!” का नारा[6] लगाया और अपने साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिये। इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गयी और दोनों को ग़िरफ़्तार कर लिया गया।

*जेल के दिन*

सिन्ध से प्रकाशित बिस्मिल की आत्मकथा का प्रथम पृष्ठ। यही पुस्तक भगतसिंह को लाहौर जेल में भेजी गयी थी।

जेल में भगत सिंह ने करीब २ साल रहे। इस दौरान वे लेख लिखकर अपने क्रान्तिकारी विचार व्यक्त करते रहे। जेल में रहते हुए उनका अध्ययन बराबर जारी रहा। उनके उस दौरान लिखे गये लेख व सगे सम्बन्धियों को लिखे गये पत्र आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं। अपने लेखों में उन्होंने कई तरह से पूँजीपतियों को अपना शत्रु बताया है। उन्होंने लिखा कि मजदूरों का शोषण करने वाला चाहें एक भारतीय ही क्यों न हो, वह उनका शत्रु है। उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूँ? जेल में भगत सिंह व उनके साथियों ने ६४ दिनों तक भूख हडताल की। उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास savisier ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिये थे।

*फ़ाँसी*

भगत सिंह का मृत्यु प्रमाण पत्र

26 अगस्त, 1930 को अदालत ने भगत सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 129, 302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 और 6एफ तथा आईपीसी की धारा 120 के अंतर्गत अपराधी सिद्ध किया। 7 अक्तूबर, 1930 को अदालत के द्वारा 68 पृष्ठों का निर्णय दिया, जिसमें भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई गई। फांसी की सजा सुनाए जाने के साथ ही लाहौर में धारा 144 लगा दी गई। इसके बाद भगत सिंह की फांसी की माफी के लिए प्रिवी परिषद में अपील दायर की गई परन्तु यह अपील 10 जनवरी, 1931 को रद्द कर दी गई। इसके बाद तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष पं. मदन मोहन मालवीय ने वायसराय के सामने सजा माफी के लिए 14 फरवरी, 1931 को अपील दायर की कि वह अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए मानवता के आधार पर फांसी की सजा माफ कर दें। महात्मा गांधी ने इस विषय को लेकर 17 फरवरी 1931 को वायसराय से बात की फिर 18 फरवरी, 1931 को आम जनता की ओर से भी वायसराय के सामने विभिन्न तर्को के साथ सजा माफी के लिए अपील दायर की। यह सब कुछ भगत सिंह की इच्छा के खिलाफ हो रहा था क्यों कि भगत सिंह नहीं चाहते थे कि उनकी सजा माफ की जाए।

23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई। फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और जब उनसे उनकी आखरी इच्छा पूछी गई तो उन्होंने कहा कि वह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और उन्हें वह पूरी करने का समय दिया जाए।[7] कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- “ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।” फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले – “ठीक है अब चलो।”

फाँसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे –

*मेरा रँग दे बसन्ती चोला,मेरा रँग दे*

*मेरा रँग दे बसन्ती चोला*

*माय रँग दे बसन्ती चोला*

फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये जहाँ घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा। गाँव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आये। इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंका और भाग गये। जब गाँव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया। और भगत सिंह हमेशा के लिये अमर हो गये। इसके बाद लोग अंग्रेजों के साथ-साथ गान्धी को भी इनकी मौत का जिम्मेवार समझने लगे। इस कारण जब गान्धी कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में हिस्सा लेने जा रहे थे तो लोगों ने काले झण्डों के साथ गान्धीजी का स्वागत किया। एकाध जग़ह पर गान्धी पर हमला भी हुआ, किन्तु सादी वर्दी में उनके साथ चल रही पुलिस ने बचा लिया।

*व्यक्तित्व*

जेल के दिनों में उनके लिखे खतों व लेखों से उनके विचारों का अन्दाजा लगता है। उन्होंने भारतीय समाज में लिपि (पंजाबी की गुरुमुखी व शाहमुखी तथा हिन्दी और अरबी एवं उर्दू के सन्दर्भ में विशेष रूप से), जाति और धर्म के कारण आयी दूरियों पर दुःख व्यक्त किया था। उन्होंने समाज के कमजोर वर्ग पर किसी भारतीय के प्रहार को भी उसी सख्ती से सोचा जितना कि किसी अंग्रेज के द्वारा किये गये अत्याचार को।

भगत सिंह को हिन्दी, उर्दू, पंजाबी तथा अंग्रेजी के अलावा बांग्ला भी आती थी जो उन्होंने बटुकेश्वर दत्त से सीखी थी। उनका विश्वास था कि उनकी शहादत से भारतीय जनता और उद्विग्न हो जायेगी और ऐसा उनके जिन्दा रहने से शायद ही हो पाये। इसी कारण उन्होंने मौत की सजा सुनाने के बाद भी माफ़ीनामा लिखने से साफ मना कर दिया था। पं० राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ ने अपनी आत्मकथा में जो-जो दिशा-निर्देश दिये थे, भगत सिंह ने उनका अक्षरश: पालन किया[8]। उन्होंने अंग्रेज सरकार को एक पत्र भी लिखा, जिसमें कहा गया था कि उन्हें अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ भारतीयों के युद्ध का प्रतीक एक युद्धबन्दी समझा जाये तथा फाँसी देने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये।[9] फाँसी के पहले ३ मार्च को अपने भाई कुलतार को भेजे एक पत्र में भगत सिंह ने लिखा था –

उन्हें यह फ़िक्र है हरदम, नयी तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है?

हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है?

दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख का क्या ग़िला करें।

सारा जहाँ अदू सही, आओ! मुक़ाबला करें।।

इन जोशीली पंक्तियों से उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है। चन्द्रशेखर आजाद से पहली मुलाकात के समय जलती हुई मोमबती पर हाथ रखकर उन्होंने कसम खायी थी कि उनकी जिन्दगी देश पर ही कुर्बान होगी और उन्होंने अपनी वह कसम पूरी कर दिखायी।

*ख्याति और सम्मान*

हुसैनीवाला में तीनों शहीदों का स्मारक

उनकी मृत्यु की ख़बर को लाहौर के दैनिक ट्रिब्यून तथा न्यूयॉर्क के एक पत्र डेली वर्कर ने छापा। इसके बाद भी कई मार्क्सवादी पत्रों में उन पर लेख छपे, पर चूँकि भारत में उन दिनों मार्क्सवादी पत्रों के आने पर प्रतिबन्ध लगा था इसलिये भारतीय बुद्धिजीवियों को इसकी ख़बर नहीं थी। देशभर में उनकी शहादत को याद किया गया।

दक्षिण भारत में पेरियार ने उनके लेख “मैं नास्तिक क्यों हूँ?” पर अपने साप्ताहिक पत्र कुडई आरसू के २२-२९ मार्च १९३१ के अंक में तमिल में सम्पादकीय लिखा। इसमें भगतसिंह की प्रशंसा की गई थी तथा उनकी शहादत को गान्धीवाद के उपर विजय के रूप में देखा गया था।

आज भी *भारत और पाकिस्तान* की जनता भगत सिंह को आज़ादी के दीवाने के रूप में देखती है जिसने अपनी जवानी सहित सारी जिन्दगी देश के लिये समर्पित कर दी।

उनके जीवन ने कई हिन्दी फ़िल्मों के चरित्रों को प्रेरित किया। कुछ फ़िल्में तो उनके नाम से बनाई गयीं जैसे – *द लीज़ेंड ऑफ़ भगत सिंह*। मनोज कुमार की सन् १९६५ में बनी फिल्म शहीद भगत सिंह के जीवन पर बनायीं गयी अब तक की सर्वश्रेष्ठ प्रामाणिक फिल्म मानी जाती

13 ਪੋਹ / 27 ਦਿਸੰਬਰ :

***********************

     ਅਜ ਦੇ ਦਿਨ ਸਰਹਿੰਦ  ਜਿਲਾ ਫਤਹਿਗੜ ਸਹਿਬ ਪੰਜਾਬ ਵਿਖੇ ਬਾਬਾ ਜ਼ੋਰਾਵਰ ਸਿੰਘ ਉਮਰ 8 ਸਾਲ ਅਤੇ ਬਾਬਾ ਫਤਿਹ ਸਿੰਘ ਉਮਰ 6 ਸਾਲ ਤਕਰੀਬਨ ਦਿਨ ਦੇ 10.45-11.00 ਵਜੇ ਦੇ ਵਿਚ ਸ਼ਹੀਦ ਕਰ ਕੀਤੇ ਗਏ। 

ਮਾਤਾ ਗੁਜਰੀ ਜੀ ਠੰਢੇ ਬੁਰਜ ਵਿੱਚ ਸਵਾਸ ਤਿਆਗ ਗਏ। 

ੲਿਹੋ ਜਿਹੀ ਲਸਾਨੀ ਦਿਤੀ ਕੁਰਬਾਨੀ ਨੂੰ ਕੋਟ ਕੋਟ ਪ੍ਰਨਾਮ ।

ਅਾਪਣੇ ਜੀਵਨ ਚੋ ਅਜ ਕੁਝ ਮਿੰਟ ਕਢਕੇ ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਜੀ ਦੇ ਲੇਖੇ ਲਾਓ….ਤਾ ਜੋ ੳੁਹਨਾ ਕੋਮ ਦੇ ਹਿਰਿਅਾ ਨੂੁੰ ਪਤਾ ਲਗ ਸਕੇ….ਕਿ ਸਾਡੇ ਧੰਨ ਧੰਨ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦਰ  ਸਹਿਬ ਜੀ ਦੇ ਪ੍ਰਵਾਰ ਵਲੋ ਦਿਤੀਅਾ ਕੁਰਬਾਨੀਅਾ ਵਿਅਰਥ ਨਹੀ ਗੲੀਅਾ।

AJJ SAHIB SRI GURU GOBIND SINGH JI MAHARAJ DE MATA GUJRI JI ATE “CHOTE SAHIBZADAE “ZORAWAR SINGH JI” TE “FATEH SINGH” JI SHAHEEDI DIWAS TE KOTAN KOT PARNAM…….

no-1 15697398_393767570968640_261817886942516402_n no-1 no-2 no3 no-4

PANJH VAARI ZARUR MULMANTAR DA PATH KARO JI “IKOA’NKAR SATNAM KARTA PURAKH NIRBHO NIRVAIR AKAL MURAT AJUNI SAIBHA’N GURPARSAD JAP AAD SACH JUGAD SACH HAI BHI SACH NANAK HOSI BHI SACH” !!

AJJ SAHIB SRI GURU GOBIND SINGH MAHARAJ JI DE “SAHIBZADAE AJIT SINGH” ATE JUJAR SINGH JI SHAHEEDI DIWAS TE KOTAN KOT PARNAM JAPO WAHEGURU WAHEGURU WAHEGURU WAHEGURU WAHEGURU…….

baba-ajit-singh-ji-baba-jujhar-singh-ji-563x353 jhujajit

 

 

 

*ਅਜ ਤੋਂ ਸਿਖ ਇਤਿਹਾਸ ਦਾ ਸ਼ਹੀਦੀ ਹਫਤਾ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋ ਗਿਅਾ ਹੈ ਆਪਣੇ ਆਪਣੇ ਪਰਿਵਾਰਾਂ ਵਿਚ ਵੱਧ ਤੋਂ ਵੱਧ ਬਾਣੀ ਪੜ੍ਹ ਕੇ ਅਤੇ ਬੱਚਿਆਂ ਨੂੰ ਇਤਿਹਾਸ ਬਾਰੇ ਦੱਸ ਕੇ ਮਨਾਓ ਜੀ।*

ਸ਼ਹੀਦੀ ਹਫਤਾ

guru-sahib-ji-pariwar

 

*6 ਪੋਹ /20 ਦਿਸੰਬਰ* : ਸਵੇਰੇ ਗੁਰੂ ਸਾਹਿਬ ਨੇ ਪਰਿਵਾਰ ਸਮੇਤ ਅਨੰਦਪੁਰ ਸਾਹਿਬ ਦਾ ਕਿਲਾ ਖਾਲੀ ਕੀਤਾ 

*6 ਪੋਹ /20 ਦਿਸੰਬਰ* : ਰਾਤ ਗੁਰੂ ਜੀ ਅਤੇ ਵਡੇ ਸਾਹਿਬਜ਼ਾਦੇ ਕੋਟਲਾ ਨਿਹੰਗ ਰੋਪੜ ਵਿਖੇ ਨਿਹੰਗ ਖਾਂ ਕੋਲ ਰਹੇ

 

ਛੋਟੇ ਸਾਹਿਬਜ਼ਾਦੇ ਅਤੇ ਮਾਤਾ ਗੁਜਰੀ ਜੀ ਕੁੰਮੇ ਮਾਸ਼ਕੀ ਦੀ ਝੁਗੀ ਵਿਚ ਰਹੇ

*7 ਪੋਹ/21 ਦਿਸੰਬਰ* : ਗੁਰੂ ਸਾਹਿਬ ਅਤੇ ਵਡੇ ਸਾਹਿਬਜ਼ਾਦੇ ਸ਼ਾਮੀ ਚਮਕੌਰ ਸਾਹਿਬ ਪਹੁੰਚੇ 

ਛੋਟੇ ਸਾਹਿਬਜ਼ਾਦੇ ਅਤੇ ਮਾਤਾ ਗੁਜਰੀ ਜੀ ਨੂੰ ਗੰਗੂ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਆਪਣੇ ਪਿੰਡ ਖੇੜੀ ਲੈ ਗਿਆ

*8 ਪੋਹ/ 22 ਦਿਸੰਬਰ* : ਚਮਕੋਰ ਦੀ ਜੰਗ ਸ਼ੁਰੂ ਬਾਬਾ ਅਜੀਤ ਸਿੰਘ ਜੀ ਉਮਰ 17 ਸਾਲ ਭਾਈ ਮੋਹਕਮ ਸਿੰਘ (ਪੰਜਾ ਪਿਆਰਿਆਂ ਵਿਚੋਂ ) ਅਤੇ 7 ਹੋਰ ਸਿੰਘਾ ਨਾਲ ਸ਼ਹੀਦ ਹੋਏ ਬਾਬਾ ਜੁਝਾਰ ਸਿੰਘ ਉਮਰ 14 ਸਾਲ ਭਾਈ ਹਿੰਮਤ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਭਾਈ ਸਾਹਿਬ ਸਿੰਘ (ਪੰਜਾ ਪਿਆਰਿਆਂ ਵਾਲੇ ) ਅਤੇ ਤਿੰਨ ਹੋਰ ਸਿੰਘਾਂ ਸਮੇਤ ਸ਼ਹੀਦ ਹੋਏ

*8 ਪੋਹ / 22 ਦਿਸੰਬਰ* : ਦੀ ਰਾਤ ਗੁਰੂ ਸਾਹਿਬ ਸਿੰਘਾ ਦੇ ਹੁਕਮ ਅੰਦਰ ਚਮਕੋਰ ਦੀ ਗੜੀ ਵਿਚੋਂ ਨਿਕਲ ਗਏ

*8 ਪੋਹ / 22 ਦਿਸੰਬਰ* : ਮੋਰਿੰਡੇ ਦੇ ਚੋਧਰੀ ਗਨੀ ਖਾਨ ਅਤੇ ਮਨੀ ਖਾਨ ਮਾਤਾ ਜੀ ਅਤੇ ਛੋਟੇ ਸਾਹਿਬਜ਼ਾਦਿਆਂ ਨੂੰ ਗੰਗੂ ਦੇ ਘਰੋਂ ਗ੍ਰਿਫਤਾਰ ਕਰਕੇ ਤੁਰ ਪਏ

*9 ਪੋਹ /23 ਦਿਸੰਬਰ* : ਤਿੰਨੋ ਸਰਹਿੰਦ ਪਹੁੰਚਾਏ ਗਏ ਅਤੇ ਠੰਡੇ ਬੁਰਜ ਵਿਚ ਰਾਤ ਰਖੇ ਗਏ

*10 ਅਤੇ 11 ਪੋਹ/ 24 ਅਤੇ 25 ਦਿਸੰਬਰ* : ਨਵਾਬ ਵਜ਼ੀਰ ਖਾਨ ਦੀ ਕਚਹਿਰੀ ਵਿਚ ਛੋਟੇ ਸਾਹਿਬਜ਼ਾਦਿਆਂ ਨੂੰ ਪੇਸ਼ ਕੀਤਾ ਗਿਆ

*12 ਪੋਹ / 26 ਦਿਸੰਬਰ* : ਬਾਬਾ ਜ਼ੋਰਾਵਰ ਸਿੰਘ ਉਮਰ 8 ਸਾਲ ਅਤੇ ਬਾਬਾ ਫਤਿਹ ਸਿੰਘ ਉਮਰ 6 ਸਾਲ ਸ਼ਹੀਦ ਕੀਤੇ ਗਏ। 

ਮਾਤਾ ਗੁਜਰੀ ਜੀ ਠੰਢੇ ਬੁਰਜ ਵਿੱਚ ਸਵਾਸ ਤਿਆਗ ਗਏ।

CLICK ON THE PICTURE

&

STAY FOR FEW SECONDS

guru-teg-bhadur-sahib-ji

=======================
ਠੀਕਰਿ ਫੋਰਿ ਦਿਲੀਿਸ ਸਿਰਿ ਪ੍ਰਭ ਪੁਰ ਕੀਆ ਪਯਾਨ ॥
ਤੇਗ ਬਹਾਦਰ ਸੀ ਿਕ੍ਰਆ ਕਰੀ ਨ ਕਿਨਹੂੰ ਆਨ ॥

ਤੇਗ ਬਹਾਦਰ ਕੇ ਚਲਤ ਭਯੋ ਜਗਤ ਕੋ ਸੋਕ ॥
ਹੈ ਹੈ ਹੈ ਸਭ ਜਗ ਭਯੋ ਜੈ ਜੈ ਸੁਰ ਲੋਕ ॥
=======================

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
ਧੰਨ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਸਾਹਿਬ ਜੀਓ ॥
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🙏  ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਜੀ ਕਾ ਖਾਲਸਾ ॥
       ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਜੀ ਕੀ ਫ਼ਤਿਹ ॥  ਜੀਓ  🙏

🙏WAHE GURU JI KA KHALSA !!
       WAHEGURU JI KI FATEH !! 🙏

🙏  वाहेगुरु जी का खालसा ||
       वाहेगुरु जी की फ़तेह || 🙏

___________________________
ਵਾਹਿਗੁਰੂਵਾਹਿਗੁਰੂਵਾਹਿਗੁਰੂਵਾਹਿਗੁਰੂਵਾਹਿਗੁਰੂ
ਵਾਹਿਗੁਰੂਵਾਹਿਗੁਰੂਵਾਹਿਗੁਰੂਵਾਹਿਗੁਰੂਵਾਹਿਗੁਰੂ
___________________________

“ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਚੜਦੀ ਕਲਾਂ ਤੇਰੇ ਭਾਣੇ ਸਰਬਤ ਦਾ ਭਲਾ”
“ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਜੀ ਆਪ ਨੂੰ ਹਮੇਸ਼ਾ ਚੜਦੀ ਕਲਾਂ ਵਿੱਚ ਰੱਖਣ”
___________________________

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
ਧੰਨ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਸਾਹਿਬ ਜੀਓ ॥
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
ਧੰਨ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਸਾਹਿਬ ਜੀਓ ॥
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
=======================
ਠੀਕਰਿ ਫੋਰਿ ਦਿਲੀਿਸ ਸਿਰਿ ਪ੍ਰਭ ਪੁਰ ਕੀਆ ਪਯਾਨ ॥
ਤੇਗ ਬਹਾਦਰ ਸੀ ਿਕ੍ਰਆ ਕਰੀ ਨ ਕਿਨਹੂੰ ਆਨ ॥

ਤੇਗ ਬਹਾਦਰ ਕੇ ਚਲਤ ਭਯੋ ਜਗਤ ਕੋ ਸੋਕ ॥
ਹੈ ਹੈ ਹੈ ਸਭ ਜਗ ਭਯੋ ਜੈ ਜੈ ਸੁਰ ਲੋਕ ॥
=======================

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
ਧੰਨ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਸਾਹਿਬ ਜੀਓ ॥
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
ਧੰਨ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਸਾਹਿਬ ਜੀਓ ॥
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
ਧੰਨ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਸਾਹਿਬ ਜੀਓ ॥
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
ਧੰਨ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਸਾਹਿਬ ਜੀਓ ॥
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
ਧੰਨ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਸਾਹਿਬ ਜੀਓ ॥
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
ਧੰਨ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਸਾਹਿਬ ਜੀਓ ॥
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
ਧੰਨ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਸਾਹਿਬ ਜੀਓ ॥
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
ਧੰਨ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਸਾਹਿਬ ਜੀਓ ॥
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
ਧੰਨ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਸਾਹਿਬ ਜੀਓ ॥
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
ਧੰਨ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਸਾਹਿਬ ਜੀਓ ॥
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
ਧੰਨ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਸਾਹਿਬ ਜੀਓ ॥
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
ਧੰਨ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਸਾਹਿਬ ਜੀਓ ॥
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

 

ਸ਼ਹੀਦ ੳੂਧਮ ਸਿੰਘ ਜੀ ਸੁਨਾਮ ਦੀ ਲਾਸਾਨੀ ਸ਼ਹਾਦਤ ਨੂੰ ਕੋਟ ਕੋਟ ਪ੍ਰਣਾਮ….

जलियांवाला बाग़ नरसंघार के मुख्या” जनरल डायर ” को 21 साल बाद लंदन में जाकर उसे मार कर इस महान वीर ने उन सभी बेकसूर लोगो का बदला लिया जिनसे उनकी कोई निजी नाता नहीं था। 21 सालो तक इन्होंने जनरल डायर का पीछा भारत से लेकर लंदन तक किया और फिर उसे किंग्स्टन हाल में सब के सामने किताब में राखी पिस्तौल से उसकी हत्या कर ख़ुशी से गिरफ़्तारी दी और हस्ते हस्ते अपना जुल्म कबूल कर यह कहा की गर्व है की मैं अपनी जान अपने देश के लिए दे रहा हूँ और आज ही की दिन फांसी पर चढ़ादिए गय। शहीदे-ऐ-आज़म “ऊधम सिंह” के बलिदान को देश का शत शत नमन।

shaheedi-sardar-udham-singh-ji-640x305 UDAM SINGH

SHAHEEDI DHIHARRA.

BANDH BANDH KATVAUN VAALE 90 SAAL DI UMAR DE MAHAAN SHAHEED SINGH

BHAI SAHIB BHAI MANI SINGH JEEE.

KAUM DE LYI AAP JI DI

SHAHADAT NU KOTAN-KOT PARNAAM……

MANI SINGH JI SEWA ON WHATSAPP

SIKH ITIHAAS DE SAB TON PEHLE SHAHEED, SHAHEEDAN DE SARTAJ DHAN DHAN SAHIB SRI GURU ARJAN DEV JI MAHARAJ DE SHAHEEDI DIWAS NU KOTI KOT PARNAM

ARJAN DEV JI MAHARAJ GURU FATEH

 

⛳श्री गुरु अर्जुन देव जी को शहीदों का सरताज कहा जाता है।

⛳भारतीय दशगुरु परम्परा के पंचम गुरु श्री गुरु अर्जुनदेव का जन्म 15 अप्रैल, 1563 ई. को हुआ। प्रथम सितंबर, 1781 को अठारह वर्ष की आयु में वे गुरु गद्दी पर विराजित हुए। 30 मई, 1606 को उन्होंने धर्म व सत्य की रक्षा के लिए 43 वर्ष की आयु में अपने प्राणों की आहुति दे दी।

⛳श्री गुरु अर्जुनदेव जी की शहादत के समय दिल्ली में मध्य एशिया के मुगल वंश के का राज जहाँगीर था और उन्हें राजकीय कोप का ही शिकार होना पड़ा। अकबर की संवत 1662 में हुई मौत के बाद उसका पुत्र जहांगीर गद्दी पर बैठा जो बहुत ही कट्टïर विचारों वाला था। अपनी आत्मकथा ‘तुजुके जहांगीरी’ में उसने स्पष्ट लिखा है कि वह गुरु अर्जुन देव जी के बढ़ रहे प्रभाव से बहुत दुखी था।

⛳इसी दौरान जहांगीर का पुत्र खुसरो बगावत करके आगरा से पंजाब की ओर आ गया। जहांगीर को यह सूचना मिली थी कि गुरु अर्जुन देव जी ने खुसरो की मदद की है इसलिए उसने गुरु जी को गिरफ्तार करने के आदेश जारी कर दिए।

⛳बाबर ने तो श्री गुरु नानक गुरुजी को भी कारागार में रखा था। लेकिन श्री गुरु नानकदेव जी तो पूरे देश में घूम-घूम कर हताश हुई जाति में नई प्राण चेतना फूंक दी।जहांगीर के अनुसार उनका परिवार मुरतजाखान के हवाले कर घरबार लूट लिया गया। इसके बाद गुरु जी ने शहीदी प्राप्त की। अनेक कष्ट झेलते हुए गुरु जी शांत रहे, उनका मन एक बार भी कष्टों से नहीं घबराया।

⛳जहांगीर ने श्री गुरु अर्जुनदेव जी को मरवाने से पहले उन्हें अमानवीय यातानाएं दी। मसलन चार दिन तक भूखा रखा गया। ज्येष्ठ मास की तपती दोपहरियां में उन्हें तपते रेत पर बिठाया गया। उसके बाद खौलते पानी में रखा गया। परन्तु श्री गुरु अर्जुनदेव जी ने एक बार भी उफ तक नहीं की और इसे परमात्मा का विधन मानकर स्वीकार किया।

⛳गुरु अर्जुन देव जी को लाहौर में 30 मई 1606 ई. को भीषण गर्मी के दौरान ‘यासा’ के तहत लोहे की गर्म तवी पर बिठाकर शहीद कर दिया गया। यासा के अनुसार किसी व्यक्ति का रक्त धरती पर गिराए बिना उसे यातनाएं देकर शहीद कर दिया जाता है। गुरु जी के शीश पर गर्म-गर्म रेत डाली गई। जब गुरु जी का शरीर अग्नि के कारण बुरी तरह से जल गया तो आप जी को ठंडे पानी वाले रावी दरिया में नहाने के लिए भेजा गया जहां गुरुजी का पावन शरीर रावी में आलोप हो गया। गुरु अर्जुनदेव जी ने लोगों को विनम्र रहने का संदेश दिया।

🙏आप विनम्रता के पुंज थे। कभी भी आपने किसी को दुर्वचन नहीं बोले। गुरबाणी में आप फर्माते हैं :

‘तेरा कीता जातो नाही मैनो जोग कीतोई॥
मै निरगुणिआरे को गुण नाही आपे तरस पयोई॥
तरस पइया मिहरामत होई सतगुर साजण मिलया॥
नानक नाम मिलै ता जीवां तनु मनु थीवै हरिया॥’

🙏तपता तवा उनके शीतल स्वभाव के सामने सुखदाईबन गया। तपती रेत ने भी उनकी ज्ञाननिष्ठा भंग न कर पायी। गुरु जी ने प्रत्येक कष्ट हंसते-हंसते झेलकर यही अरदास की-

तेरा कीआ मीठा लागे॥ हरि नामु पदारथ नानक मांगे॥

⛳जहांगीर द्वारा श्री गुरु अर्जुनदेव जी को दिए गए अमानवीय अत्याचार और अन्त में उनकी मृत्यु जहांगीर की इसी योजना का हिस्सा था। श्री गुरु अर्जुनदेव जी जहांगीर की असली योजना के अनुसार ‘इस्लाम के अन्दर’ तो क्या आते, इसलिए उन्होंने विरोचित शहादत के मार्ग का चयन किया।

⛳इधर जहांगीर की आगे की तीसरी पीढ़ी या फिर मुगल वंश के बाबर की छठी पीढ़ी औरंगजेब तक पहुंची। उधर श्री गुरुनानकदेव जी की दसवीं पीढ़ी थी। श्री गुरु गोविन्द सिंह तक पहुंची। यहां तक पहुंचते-पहुंचते ही श्री नानकदेव की दसवीं पीढ़ी ने मुगलवंश की नींव में डायनामाईट रख दिया और उसके नाश का इतिहास लिख दिया। संसार जानता है कि मुट्ठी भर मरजीवड़े सिंघ रूपी खालसा ने 700 साल पुराने विदेशी वंशजों को मुगल राज सहित सदा के लिए ठंडा कर दिया। 100 वर्ष बाद महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में भारत ने पुनः स्वतंत्राता की सांस ली। शेष तो कल का इतिहास है, लेकिन इस पूरे संघर्षकाल में पंचम गुरु श्री गुरु अर्जुनदेव जी की शहादत सदा सर्वदा सूर्य के ताप की तरह प्रखर रहेगी।

PLZ LIKE & SHARE THIS PAGE…..

WAHEGURU JI KA KHALSA !!
WAHEGURU JI KI FATEH !!
🙏🙏🙏🙏🙏